Sunday, April 21, 2013

रिश्ते रक्तरंजित है, उसमे घुसपैठ दलालों की
करनी होगी निगरानी, भेडियो के हर चालो की
यह बुरा वक्त है, तुम्हे खुद सक्षम बनना होगा 
यह लो बेटी लाठी मेरी, करो ठोकाई सालो की


Friday, April 19, 2013


सब संतुष्ट, जैसे चल रहा वैसे चलने दो
जो हाथ मल रहा, उसको हाथ मलने दो
 
सभी मुवक्किल से लगातार बताते यही 
कोशिश में है यार, पहले बेंच बदलने दो

आखिर कब तक रहे, इस झूठ के सहारे
बात सही फिर भी किसी को खलने दो

स्वागत सबका, न्याय के इस मंदिर में
जो यहाँ आया है टहलने, उसे टहलने दो   


वकालत के पेशे में तो, बड़ा झंझावत है भाई 
अकेले में सोचो तो, बस आँसू आवत है भाई 

मुकदमा न मिले तो, भविष्य खोने की चिंता 
इसी बात की डर, अब बहुत सतावत है भाई 

ग़र वो मिलने लगे तो, उसके होने की चिंता 
अदालत से आ कर, अक्सर बतावत है भाई 

दिन रात फोन पर, मुवक्किल से किचकिच 
चौबीसों घंटा अब यह पेशा, खटावत है भाई 

इसमें कोई मोहब्बत से, कबहू बोले न बोली
 भले दूसरे का दुःख दर्द, हम हटावत है भाई

ये कैसी हवा चली, जो विष घोल रही सवेरे में
दूल्हा दुलहन डिग जाये, संग लिए उन फेरे में   
है दोनों अभिन्न अंग, जब न्याय के मंदिर के 
ऐसे में अब कैसे निष्ठा, आयी शक के घेरे में  


Wednesday, April 17, 2013


उतना घातक नहीं, राजनीति का समीकरण
जितना घातक है, शिक्षा का व्यवसायीकरण

कुपोषण के शिकार हो, ये बच्चे अगर देश के 
देश में नहीं पैदा होगे, फिर अर्जुन और करण

मंदिरों के घंटे अज़ाने मस्जिदों की, अब कहाँ
अब सुन कर सायरन, रो रहा यह अंतःकरण

चाह कहाँ थी फूलो की, चढने जाय मंदिरों में  
रौद रहा फूलो को, नेता जी का नापाक चरण  

इंसान हो कर भी हम, तौर तरीके खोते जा रहे है
जाने क्यों जानवरों के गुण, अब हमको भा रहे है   
हम उछल कूद करते है, दावत और राजनीती में 
ये उछल कूद में है माहिर, वो सलीके से खा रहे है 


Sunday, April 7, 2013


अगर डाक्टर हो, मानव बनके देखभाल करो
भगवान के वास्ते, सिर्फ पार मत माल करो
सब रह जायेगा ये ठाट बाट, यही धरा का धरा    
ठिकाना कब्र है तेरा भी, ये भी तो ख्याल करो  





भगवान रहे होगे पर आये राक्षस आज बनकर
मार रहे झपट्टा मरीजो की जेब पर बाज़ बनकर   
इस क़दर की लापरवाही इलाज में, की लील ली 
आज एक जिन्दगी डाक्टर ने--यमराज बनकर 



Saturday, April 6, 2013







एक तरफ तो बेईमानी को जी भर गरियाते रहे 
दूसरी तरफ उसी से आयी नोट को सरियाते रहे
भौतिक सुख की चाहत ने हमें बेहया बना दिया
बेह्यापन की तपन धूप में भी हम हरियाते रहे   

Friday, April 5, 2013


सीधे हमारे घर आना, कोई पहरेदारी नहीं है 
सुना है वही जायोगे, जहाँ ईमानदारी नहीं है 

अभी बिलकुल नए हो, सियासत के शहर में 
सबसे पहले वो मिलेंगे, जिनमें खुद्दारी नहीं है

मैंने आगाह कर दिया, अपने शहर के लोगे से 
फंसने पर ये मत कहना, गलती हमारी नहीं है 

एक जगह है मुनासिब, वो किसी गरीब का घर
जहाँ गरीबी तो रहेगी ही, पर वहाँ गद्दारी नहीं है